अरुणाचल प्रदेश जलविद्युत के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग लगाने की तैयारी में है। सुबनसिरी लोअर जलविद्युत परियोजना की चार इकाइयों से व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो गया है, जिससे कुल 1000 मेगावाट बिजली ग्रिड में जुड़ गई है।
यह परियोजना एनएचपीसी लिमिटेड द्वारा विकसित की जा रही है और इसके पूरी तरह चालू होने पर इसकी कुल क्षमता 2000 मेगावाट होगी, जिसमें 250-250 मेगावाट की आठ इकाइयां शामिल हैं।
परियोजना की वर्तमान स्थिति
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सुबनसिरी लोअर परियोजना की आठ में से चार इकाइयां अब व्यावसायिक संचालन में हैं। शेष चार इकाइयां अभी विकास और कमीशनिंग की तैयारी के चरण में हैं।
यह परियोजना सुबनसिरी नदी पर गेरुकामुख में स्थित है, जो अरुणाचल प्रदेश और असम की सीमा पर है। सुबनसिरी ब्रह्मपुत्र की एक सहायक नदी है। परियोजना की कुल लागत लगभग 30,071 करोड़ रुपये बताई गई है। पूरी क्षमता पर इसके लगभग 7,422 मिलियन यूनिट वार्षिक बिजली उत्पादन की उम्मीद है।
परियोजना में 116 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध बनाया गया है। यह रन-ऑफ-द-रिवर प्रकार की परियोजना है, जिसमें नदी के प्राकृतिक प्रवाह का उपयोग बिजली उत्पादन के लिए किया जाता है।
लंबा सफर, बड़ी उपलब्धि
सुबनसिरी लोअर परियोजना का निर्माण कार्य कई वर्षों से चल रहा था और इसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। भूवैज्ञानिक जटिलताओं, पर्यावरणीय चिंताओं और स्थानीय विरोध के कारण परियोजना में देरी हुई।
चार इकाइयों का व्यावसायिक संचालन में आना इस परियोजना के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। इससे न केवल अरुणाचल प्रदेश बल्कि पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र की बिजली स्थिति में सुधार होगा।
पांच नई परियोजनाओं की योजना
सुबनसिरी लोअर के अलावा, अरुणाचल प्रदेश में पांच और जलविद्युत परियोजनाओं की योजना है, जिनमें 52,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश प्रस्तावित है। इनकी संयुक्त नियोजित क्षमता लगभग 4,000 मेगावाट बताई गई है।
इन परियोजनाओं के विकासकर्ता, व्यक्तिगत क्षमता और समय-सारणी जैसे विवरण अभी स्पष्ट नहीं हुए हैं, लेकिन इन्हें स्वीकृत निवेश के रूप में रिपोर्ट किया गया है। इन परियोजनाओं के विकास और खरीद चरण अभी तय होने बाकी हैं।
राज्य के लिए महत्व
अरुणाचल प्रदेश को भारत की जलविद्युत राजधानी कहा जाता है, क्योंकि यहां नदियों में बिजली उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। इन परियोजनाओं से राज्य को रॉयल्टी और मुफ्त बिजली के रूप में बड़ा राजस्व मिलेगा, जिससे विकास कार्यों को गति मिलेगी।
हालांकि, बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं और स्थानीय समुदायों के विस्थापन जैसे मुद्दे भी उठते रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा।
सियांग नदी पर प्रस्तावित अपर सियांग बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर भी चर्चा चल रही है, लेकिन मुख्यमंत्री ने कहा है कि तकनीकी स्पष्टता और सामुदायिक परामर्श के बिना यह परियोजना व्यवहार्यता अध्ययन से आगे नहीं बढ़ेगी।
रोजगार और विकास की उम्मीद
इन परियोजनाओं से निर्माण चरण में हजारों लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है। साथ ही, सड़क, पुल और अन्य बुनियादी ढांचे के विकास से दूरदराज के इलाकों को भी फायदा होगा। राज्य सरकार इन परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा करने पर जोर दे रही है।
पर्यावरणीय चिंताएं और विरोध
बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं हमेशा से रही हैं। सुबनसिरी लोअर परियोजना को भी अपने निर्माण के दौरान पर्यावरणविदों और स्थानीय समुदायों के विरोध का सामना करना पड़ा था।
आलोचकों का कहना है कि बड़े बांधों से नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव आता है, जिससे जलीय जीवन और आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ता है। विस्थापन का मुद्दा भी अहम है, क्योंकि बांध निर्माण के लिए कई गांवों को स्थानांतरित करना पड़ता है।
हालांकि, समर्थकों का तर्क है कि जलविद्युत स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत है और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने में मदद करता है। उनका कहना है कि उचित पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के साथ इन परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जा सकता है।













