पूर्वोत्तर भारत में विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर व्यापक विरोध देखा जा रहा है। क्षेत्र के विभिन्न संगठनों और समुदायों का कहना है कि यह विधेयक जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण सेवाएं देने वाले संस्थानों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर सकता है।
विरोध का केंद्र विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) के तहत विदेशी फंडिंग पर प्रस्तावित सख्त प्रतिबंध हैं।
पूर्वोत्तर की अनूठी निर्भरता
दशकों से भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र का बड़ा हिस्सा — जो दुर्गम भूभाग, कठिन संपर्क और ऐतिहासिक हाशियाकरण से जूझता रहा है — सामाजिक बुनियादी ढांचे की खामियों को पाटने के लिए गैर-सरकारी संगठनों, मिशन-संचालित नेटवर्कों और परोपकारी संस्थाओं पर निर्भर रहा है।
मेघालय, नगालैंड, मिजोरम, मणिपुर और असम के कई दूरदराज के जिलों में राज्य सरकार की प्रशासनिक पहुंच सीमित है। यहां चर्च से जुड़े निकायों और स्थानीय ट्रस्टों ने शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों और अनाथालयों के निर्माण और प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
इनमें से कई संस्थान दशकों से काम कर रहे हैं और स्थानीय समुदायों के जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं।
विदेशी फंडिंग की भूमिका
इन मानवीय कार्यों को चलाने के लिए आवश्यक पूंजी का एक बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक रूप से विदेशी अंशदान के माध्यम से विदेशी दाताओं से आता रहा है। इसलिए FCRA पर प्रतिबंध लगाने वाले किसी भी विधायी उपाय को स्थानीय आबादी केवल नौकरशाही समायोजन के रूप में नहीं देखती।
आशंका यह है कि बाहरी फंडिंग चैनलों पर प्रतिबंधात्मक अंकुश लगाने से अनजाने में उन जमीनी संस्थानों के संसाधन सूख जाएंगे जो कमजोर आबादी की सेवा के लिए इन संसाधनों पर निर्भर हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले कई छोटे संगठन पहले से ही फंडिंग की कमी से जूझ रहे हैं। नए प्रतिबंधों से उनकी मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि संशोधनों का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना और धन के दुरुपयोग को रोकना है। अधिकारियों का तर्क है कि कुछ संगठनों ने विदेशी फंडिंग का दुरुपयोग किया है, इसलिए सख्त निगरानी जरूरी है।
हालांकि, पूर्वोत्तर के हितधारकों का तर्क है कि व्यापक प्रतिबंधों के बजाय लक्षित निगरानी व्यवस्था अधिक उपयुक्त होगी। उनका कहना है कि ईमानदार संगठनों को दंडित करने के बजाय दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
आगे की बहस
यह बहस विकास, पारदर्शिता और जमीनी हकीकत के बीच संतुलन की पुरानी चुनौती को फिर से सामने लाई है। विधेयक पर संसद में चर्चा के दौरान पूर्वोत्तर के सांसदों द्वारा इस मुद्दे को उठाए जाने की उम्मीद है।
पूर्वोत्तर के प्रसिद्ध व्यंजन
पूर्वोत्तर भारत का खानपान अपनी विविधता के लिए जाना जाता है। असम का पारंपरिक थाली, जिसमें चावल, दाल, सब्जियां और मछली के व्यंजन शामिल होते हैं, स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। नगालैंड का स्मोक्ड पोर्क और बंबू शूट का अचार देश भर में लोकप्रिय हो रहा है।
मणिपुर का इरोम्बा — उबली सब्जियों, मछली और राजा मिर्च से बना व्यंजन — अपने अनूठे स्वाद के लिए जाना जाता है। मेघालय के जदोह (मांस और चावल का व्यंजन) और तुंगताप (किण्वित मछली की चटनी) भी खास हैं। मिजोरम का बाई (उबली सब्जियों का स्टू) और सिक्किम के मोमो तो अब पूरे देश में मशहूर हैं।
फूड टूरिज्म की संभावनाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्वोत्तर में फूड टूरिज्म की अपार संभावनाएं हैं। हॉर्नबिल फेस्टिवल जैसे आयोजनों में पहले से ही खानपान एक बड़ा आकर्षण है। ‘द एनचांटिंग 8’ सीरीज इस क्षमता को राष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाएगी।
स्थानीय खाद्य उद्यमियों का कहना है कि इस तरह की पहल से उनके उत्पादों को बड़ा बाजार मिलेगा। पूर्वोत्तर के कई स्टार्टअप पहले से ही बंबू शूट के अचार, राजा मिर्च की चटनी और हर्बल चाय जैसे उत्पादों को ऑनलाइन बेच रहे हैं।













